काग़ज़-क़लम
ये काग़ज़-क़लम न होते,
तो हम जैसे क्या करते ?
किससे कहते अपनी बात,
किसको हाल सुनाते ?
ये काग़ज़-क़लम न होते,
तो हम जैसे कैसे रहते?
कभी किसी से कुछ न कहते,
किसको क्या समझाते?
ये काग़ज़-क़लम न होते,
तो हम जैसे कैसे सहते ?
मन ही मन घुट-घुट कर,
हम अपने ज़ख़्म छिपाते।
ये काग़ज़ और क़लम न होते,
तो बोलो हम क्या करते?